उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhko nahin dimagh gulon ki shamim ka

मुझ को नहीं दिमाग़ गुलों की शमीम का

مجھ کو نہیں دماغ گلوں کی شمیم کا

शायर: Zabih Allahabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझ को नहीं दिमाग़ गुलों की शमीम का
एहसान क्यों उठाऊँ क़फ़स में नसीम का

मेरी निगाह-ए-शौक़ पहुँच जाएगी वहीं
पाया बुलंद लाख हो तेरे हरीम का

फैली है उस की ख़ाना-ए-का'बा में रौशनी
है दाग़-ए-दिल चराग़ रह-ए-मुस्तक़ीम का

हम बू-ए-गुल के साथ क़फ़स को भी ले उड़े
आया चमन में जब कोई झोंका नसीम का

ये मेरे एक अश्क-ए-नदामत का था असर
शो'ला भड़क के बुझ गया नार-ए-जहीम का

मय-खाना-ए-अज़ल का हूँ मैं मस्त वो 'ज़बीह'
पीता हूँ ले के नाम ग़फ़ूर-उर-रहीम का