उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ulfat mein aisi laghzish-e-mastana chahiye

उल्फ़त में ऐसी लग़्ज़िश-ए-मस्ताना चाहिए

الفت میں ایسی لغزش مستانہ چاہیے

शायर: JaiKrishn Chaudhry Habeeb8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उल्फ़त में ऐसी लग़्ज़िश-ए-मस्ताना चाहिए
दर पर तिरे गिरें तो सँभलना न चाहिए

है आलम-ए-शबाब किसी का निगाह में
मेरी नज़र को और तमाशा न चाहिए

साक़ी की इक निगाह पे मदहोश बज़्म है
गर्दिश में अब तो साग़र-ओ-मीना न चाहिए

चिलमन की तीलियों से रुकी कब निगाह-ए-शौक़
उस पर कभी भी बंदिश-ए-बेजा न चाहिए

साक़ी-गरी की लाज रखो ये तो एहतिमाम
कोई भी रिंद बज़्म में प्यासा न चाहिए

फ़र्ज़ानगी से तय हुई कब मंज़िल-ए-हयात
रख़्त-ए-सफ़र में इक दिल-ए-दीवाना चाहिए

हर हर क़दम पे सोच के चलना अजीब है
जीने को कुछ तो जुरअत-ए-रिंदाना चाहिए

कम है 'हबीब' उम्र तअस्सुफ़ के वास्ते
दुनियाँ को बात बात पे झुटलाना चाहिए