उर्दू शायरी · ग़ज़ल

TuTe hue KHwabon ki chubhan kam nahin hoti

टूटे हुए ख़्वाबों की चुभन कम नहीं होती

ٹوٹے ہوئے خوابوں کی چبھن کم نہیں ہوتی

शायर: Qaisarul Jafri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

टूटे हुए ख़्वाबों की चुभन कम नहीं होती
अब रो के भी आँखों की जलन कम नहीं होती

कितने भी घनेरे हों तिरी ज़ुल्फ़ के साए
इक रात में सदियों की थकन कम नहीं होती

होंटों से पिएँ चाहे निगाहों से चुराएँ
ज़ालिम तिरी ख़ुशबू-ए-बदन कम नहीं होती

मिलना है तो मिल जाओ यहीं हश्र में क्या है
इक उम्र मिरे वा'दा-शिकन कम नहीं होती

'क़ैसर' की ग़ज़ल से भी न टूटी ये रिवायत
इस शहर में ना-क़दरी-ए-फ़न कम नहीं होती