उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tu to tanha sar-e-bazar nikal jata hai

तू तो तन्हा सर-ए-बाज़ार निकल जाता है

تو تو تنہا سر بازار نکل جاتا ہے

शायर: Ibrahim Ali Zeeshan5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तू तो तन्हा सर-ए-बाज़ार निकल जाता है
देखते देखते माहौल बदल जाता है

तुम ने हर बार मिरे 'इश्क़ का इंकार किया
इतनी कोशिश में फटा नोट भी चल जाता है

जब भी लगती है भनक आप से मंसूब हूँ मैं
सामने वाले का लहजा ही बदल जाता है

देर तक रह नहीं पाती तिरे चेहरे पे नज़र
इस चढ़ाई पे मिरा पाँव फिसल जाता है

धूप से हाथ छुड़ाया तो हमें 'इल्म हुआ
साया औक़ात से बाहर भी निकल जाता है