उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aankh se kaise kahun ab bhi andhera dekhe

आँख से कैसे कहूँ अब भी अंधेरा देखे

آنکھ سے کیسے کہوں اب بھی اندھیرا دیکھے

शायर: Ibrahim Ali Zeeshan7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आँख से कैसे कहूँ अब भी अंधेरा देखे
मुद्दतें बीत गईं धूप का जल्वा देखे

दो गिलासों में समुंदर तो नहीं आ सकता
ये नज़र तुझ को अगर देखे तो कितना देखे

घूम कर देख लिया सारा ज़माना मैं ने
अब तो बनता है मुझे सारा ज़माना देखे

ऐसे पढ़ता हूँ क़सीदे तिरी रा'नाई के
है जो महरूम-ए-नज़र वो भी सरापा देखे

जा रहा था वो मुझे छोड़ के ऐसे उस दिन
मैं ने भी चाहा नहीं मुड़ के दुबारा देखे

उस के जाने पे ख़ुशी भी थी मुझे फ़िक्र भी थी
जैसे माँ मदरसे जाता हुआ बच्चा देखे

बहुत इतराता है आज़ादी पे अपनी कोई
उस से कहना कभी आ कर मिरा पिंजरा देखे