उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chashm dekhun na main uski na hi abru dekhun

चश्म देखूँ न मैं उस की न ही अबरू देखूँ

چشم دیکھوں نہ میں اس کی نہ ہی ابرو دیکھوں

शायर: Ibrahim Ali Zeeshan5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चश्म देखूँ न मैं उस की न ही अबरू देखूँ
फिर वो क्या शय है जिसे दुनिया में हर-सू देखूँ

इस भरे शहर में बस एक ही सौदागर है
अब मैं सामान खरीदूँ कि तराज़ू देखूँ

जंग ने छोड़ दिए ज़ख़्म मिरे हाथों पर
फ़त्ह का जश्न मनाऊँ कि ये बाज़ू देखूँ

मुझ को हालात ने इस सम्त धकेला है मगर
मेरी ये 'उम्र कहाँ है कि मैं घुँगरू देखूँ

इन उजालों से बंधी हैं मिरी आँखें 'ज़ीशाँ'
इन उजालों से निकल जाऊँ तो घुँगरू देखूँ