उर्दू शायरी · ग़ज़ल

janab-e-ali bichhaDne ki koi baat nahin

जनाब-ए-'आली बिछड़ने की कोई बात नहीं

جناب عالی بچھڑنے کی کوئی بات نہیں

शायर: Ibrahim Ali Zeeshan6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जनाब-ए-'आली बिछड़ने की कोई बात नहीं
हमारे सीने में इक दिल है पाँच सात नहीं

बहुत झिझक के किया है मुसाफ़हा तुम ने
तुम्हारे हाथ में शायद तुम्हारा हाथ नहीं

ज़माने भर से त'अल्लुक़ की पर्दा-दारी है
किसे बताएँ कि अब तू हमारे साथ नहीं

हमारी ज़ात से बाहर हमें तलाश करो
हमारी ज़ात के अंदर हमारी ज़ात नहीं

मैं चाहता हूँ त'अल्लुक़ बहाल करना मगर
तुम्हारा दिल ही नहीं है तो कोई बात नहीं

हम अपने पैरों को ये बात कैसे समझाएँ
अब उस गली में हमारे मु'आमलात नहीं