उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tu na paega kahin zauq-e-qaza mere baad

तू न पाएगा कहीं ज़ौक़-ए-क़ज़ा मेरे बाद

تو نہ پائے گا کہیں ذوق قضا میرے باد

शायर: Daood Kaashmiri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तू न पाएगा कहीं ज़ौक़-ए-क़ज़ा मेरे बाद
जो दम-ए-मर्ग दे क़ातिल को दुआ मेरे बा'द

लोग कतरा के मिरे घर से गुज़र जाते थे
आज क्यों शहर में मातम है बपा मेरे बा'द

था फ़रिश्तों का भी मा'बूद वही एक मगर
अपनी तख़्लीक़ पे नाज़ाँ है ख़ुदा मेरे बा'द

हम ने तन्हाई से यारी तो निभा दी लेकिन
यार से यार कभी हो न जुदा मेरे बा'द

अहद-ए-तिफ़्ली से बुढ़ापे का सफ़र था कि घुटन
ख़त्म हो जाए ये ज़हरीली फ़ज़ा मेरे बा'द