उर्दू शायरी · ग़ज़ल

be-KHabar apne muqaddar se raha pahle-pahal

बे-ख़बर अपने मुक़द्दर से रहा पहले-पहल

بے خبر اپنے مقدر سے رہا پہلے پہل

शायर: Daood Kaashmiri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बे-ख़बर अपने मुक़द्दर से रहा पहले-पहल
जब क़दम शहर-ए-ज़ुलेख़ा में रखा पहले-पहल

बाज़गश्त उस की हैं जितनी भी ये आवाज़ें हैं
हर तरफ़ गूँज गई एक सदा पहले-पहल

अपनी मंज़िल का वहीं हो गया इरफ़ान मुझे
जब मिला राह में इक नक़्श-ए-वफ़ा पहले-पहल

लोग पहचान न पाए किसी दीवाने को
जाने किस तरह ये दस्तूर बना पहले-पहल

आज हर शख़्स को दावा है ख़ुदाई का यहाँ
जब कि हर शख़्स का था एक ख़ुदा पहले-पहल