उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tumhaare shahr mein dekhun to kya nahin milta

तुम्हारे शहर में देखूँ तो क्या नहीं मिलता

تمہارے شہر میں دیکھوں تو کیا نہیں ملتا

शायर: Zafar Zaidi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तुम्हारे शहर में देखूँ तो क्या नहीं मिलता
बस अपने घर के लिए रास्ता नहीं मिलता

उरूज पर है नए मौसमों का जाह-ओ-जलाल
शजर पे कोई भी पत्ता हरा नहीं मिलता

अभी अभी कोई आँधी इधर से गुज़री है
रह-ए-हयात मुझे नक़्श-ए-पा नहीं मिलता

बिछड़ के तुझ से तबीअत उचाट रहती है
ख़ुद अपने घर में भी घर का मज़ा नहीं मिलता

तुम्हें भी रोज़ कहानी वही सुनानी है
मुझे भी ख़्वाब कोई दूसरा नहीं मिलता

मता-ए-बर्ग-ओ-समर भी लुटा चुके अश्जार
किसी तरह भी मिज़ाज-ए-हवा नहीं मिलता

मैं किस तरह से 'ज़फ़र' मसअलों को सुलझाऊँ
किसी भी बात का कोई सिरा नहीं मिलता