उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chand fiqre zer-e-lab taDpa kiye

चंद फ़िक़रे ज़ेर-ए-लब तड़पा किए

چند فقرے زیر لب تڑپا کیے

शायर: Zafar Zaidi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चंद फ़िक़रे ज़ेर-ए-लब तड़पा किए
वो हमें और हम उन्हें देखा किए

ग़म था अपनी बद-नसीबी का उन्हें
देर तक कुछ लफ़्ज़ कल रोया किए

मेरे क़दमों में रही मंज़िल मिरी
रास्ते सूरत मिरी देखा किए

ग़म भी इक ने'मत है लेकिन दोस्तो
हम उसे पाया किए खोया किए

मुझ से मिल कर कल मिरे अहबाब भी
देर तक क्या जाने क्या सोचा किए

जिस से रहती थी मुनव्वर ये ज़मीं
आसमाँ वो चाँद तारे क्या किए

आसमानों की तरफ़ चल दी ज़मीं
हम अंधेरे ग़ार में सोया किए

मिल न पाया ज़िंदगी का कुछ सुराग़
मुद्दतें गुज़रीं हमें पीछा किए

चल दिया इक और पत्ता टूट कर
आँधियों के दोश पर तकिया किए

कोई भी धरती न रास आई हमें
हम ख़लाओं में 'ज़फ़र' देखा किए