उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dasht ka lamba safar tha dur tak saya na tha

दश्त का लम्बा सफ़र था दूर तक साया न था

دشت کا لمبا سفر تھا دور تک سایہ نہ تھا

शायर: Zafar Zaidi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दश्त का लम्बा सफ़र था दूर तक साया न था
लौट जाने के सिवा आगे कोई रस्ता न था

आँधियाँ बे-जान शाख़ों से उलझतीं भी तो क्या
पेड़ के नंगे बदन पर एक भी पत्ता न था

खुल के दोनों लड़ रहे थे इक ज़रा सी बात पर
रोकने के वास्ते घर में कोई बूढ़ा न था

सो गया आँगन में मैं फिर चुप की चादर ओढ़ कर
खटखटाता क्या मिरे कमरे में दरवाज़ा न था

बोलने लगते हैं झींगुर कान की दहलीज़ पर
जिस्म में मेरे कभी भी इतना सन्नाटा न था