उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab uske milne ka koi guman bhi to nahin

अब उस के मिलने का कोई गुमान भी तो नहीं

اب اس کے ملنے کا کوئی گمان بھی تو نہیں

शायर: Zafar Zaidi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब उस के मिलने का कोई गुमान भी तो नहीं
कि मेरे शहर में उस का मकान भी तो नहीं

सुलगना धूप में है भीगना है बारिश में
कि मेरे सर पे कोई साएबान भी तो नहीं

उन्होंने पूछा जो मुझ से सबब ख़मोशी का
कहूँगा क्या मिरे मुँह में ज़बान भी तो नहीं

मैं अपने-आप से रहता हूँ बे-तअल्लुक़ सा
नज़र में मेरी कोई इम्तिहान भी तो नहीं