उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tumhaare shahr mein tha bhi to ek musafir main

तुम्हारे शहर में था भी तो इक मुसाफ़िर मैं

تمہارے شہر میں تھا بھی تو اک مسافر میں

शायर: Zafar Zaidi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तुम्हारे शहर में था भी तो इक मुसाफ़िर मैं
सो थक के बैठ गया रास्ते में आख़िर मैं

मैं हर लिहाज़ से सैराब था ख़ुदा की क़सम
ये और बात कि प्यासा रहा ब-ज़ाहिर मैं

हुरूफ़ मिलते ही आवाज़ डूब जाती है
जो चुप रहूँ न बताओ तो क्या करूँ फिर मैं

किसी भी सम्त भटकता फिरूँ यमीन-ओ-यसार
तलाश राह करूँ भी तो किस की ख़ातिर मैं

मिरी ख़ुशी को यही रब्त बाहमी है बहुत
मिरा मुग़न्नी है वो और उस का शा'इर मैं

ये खेल ख़त्म बना हार-जीत के होगा
कि जिस हुनर में वो यकता उसी में माहिर मैं

हज़ार बाँधा गया मुझ पे आइनों का हिसार
किसी पे अपने 'अलावा हुआ न ज़ाहिर मैं