उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tum ye kahte ho main likh dun ek pechida kitab

तुम ये कहते हो मैं लिख दूँ एक पेचीदा किताब

تم یہ کہتے ہو میں لکھ دوں ایک پیچیدہ کتاب

शायर: Maham Khan7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तुम ये कहते हो मैं लिख दूँ एक पेचीदा किताब
किस ने माँगा है समुंदर से यूँ मौजों का हिसाब

कब तलक तुम हाल-ए-दिल अपना छुपाओगे यहाँ
इस रुख़-ए-नाज़ुक प ले इक मुस्कुराहट का हिजाब

ख़ार-ओ-ख़स की ओट में भी खिल उठा था एक फूल
कुछ कँवल की नाज़ुकी थी कुछ था अंदाज़-ए-गुलाब

क्यों अचानक ज़ीस्त की महफ़िल हुई है सोगवार
किस की आमद से हुआ लुत्फ़-ए-चमन ज़ेर-ए-‘इताब

या तो दश्त-ए-'इश्क़ में चश्मा मुरव्वत का बहा
या वो सहरा-ए-मोहब्बत का था इक संगीं सराब

कुछ तो महकी हैं फ़ज़ाएँ कुछ हवा भी मेहरबाँ
हाँ मगर दिल पर बहार-ए-दिल-नशीं मिस्ल-ए-‘अज़ाब

हाँ ज़रूरत है तिरी 'माहम' अमावस में भी आज
हैं सितारे भी परेशाँ शब की हालत भी ख़राब