उर्दू शायरी · ग़ज़ल

abhi is qissa-e-gham ko na tum chheDo na hum chheDen

अभी इस क़िस्सा-ए-ग़म को न तुम छेड़ो न हम छेड़ें

ابھی اس قصۂ غم کو نہ تم چھیڑو نہ ہم چھیڑیں

शायर: Maham Khan5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अभी इस क़िस्सा-ए-ग़म को न तुम छेड़ो न हम छेड़ें
मरीज़-ए-'इश्क़-ए-बे-दम को न तुम छेड़ो न हम छेड़ें

गुलिस्तान-ए-मोहब्बत पर कोहर सा छा गया जैसे
गुलों पे रक़्स-ए-शबनम को न तुम छेड़ो न हम छेड़ें

मोहब्बत के फ़साने का भला अंजाम क्या होगा
अभी इस फ़िक्र-ए-बाहम को न तुम छेड़ो न हम छेड़ें

उदासी का घना साया है उस मा'सूम चेहरे पर
हाँ उस की ज़ुल्फ़ के ख़म को न तुम छेड़ो न हम छेड़ें

अँधेरी रात में फिर से क़यामत ढा रहा है वो
नदी में 'अक्स-ए-'माहम' को न तुम छेड़ो न हम छेड़ें