उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nigah-e-yar ka mujh pe KHumar rahne do

निगाह-ए-यार का मुझ पे ख़ुमार रहने दो

نگاہ یار کا مجھ پہ خمار رہنے دو

शायर: Maham Khan7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

निगाह-ए-यार का मुझ पे ख़ुमार रहने दो
अब उन के 'इश्क़ का मुझ को शिकार रहने दो

जो रू-ब-रू हो तो जी भर के देख लेने दो
तुम आज वा'दा-ए-क़ौल-ओ-क़रार रहने दो

ये तय है सा'अत-ए-फ़ुर्क़त का ग़म भी सहना है
फ़सील-ए-‘इश्क़ में राह-ए-फ़रार रहने दो

सबक़ न मुझ को सिखाओ अब 'अक़्ल-ओ-दानिश का
कि मेरा 'आशिक़ों में ही शुमार रहने दो

चुका न पाएँगे तेरा ये क़र्ज़-ए-मेहर-ओ-वफ़ा
सो कुछ दिनों की मोहब्बत उधार रहने दो

यूँ मेरे सामने तुम जल्वा-गर हुआ न करो
जो मुझ में हौसला है बरक़रार रहने दो

जो शब के आख़िरी पहरों में तुम भी 'माहम' को
पलट के देखते हो बार-बार रहने दो