उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nahin KHud par bhi qabu aur KHudai chahte hain hum

नहीं ख़ुद पर भी क़ाबू और ख़ुदाई चाहते हैं हम

نہیں خود پر بھی قابو اور خدائی چاہتے ہیں ہم

शायर: Maham Khan5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नहीं ख़ुद पर भी क़ाबू और ख़ुदाई चाहते हैं हम
वो ठहरा चाँद और उस तक रसाई चाहते हैं हम

तिरी कोई अदा तो यूँ 'अयाँ हो जाएगी हम पे
तिरी जानिब से जानाँ बेवफ़ाई चाहते हैं हम

महज़ ख़्वाबों ख़यालों में तिरा दीदार हो कब तक
हक़ीक़त में भी तुझ से आश्नाई चाहते हैं हम

पिएँ साक़ी के हाथों से मय-ए-उल्फ़त पिएँ जब भी
मिरे नासेह बस इतनी पारसाई चाहते हैं हम

हम अब ग़र्क़-ए-तख़य्युल हैं बस अपनी ज़ात में इतने
सिवा उन के हर इक से ही जुदाई चाहते हैं हम