उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tum Tahniyon ki phul-jhaDiyon se jashn-e-shah-balut manana

तुम टहनियों की फुल-झड़ियों से जश्न-ए-शाह-बलूत मनाना

تم ٹہنیوں کی پھلجھڑیوں سے جشن شاہ بلوط منانا

शायर: Yasir Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तुम टहनियों की फुल-झड़ियों से जश्न-ए-शाह-बलूत मनाना
शहज़ादे के शगूफ़े को इक शाख़चा-ए-मज़बूत बताना

सीनों के एहरामों वाले ज़िंदा अजूबे धड़-धड़ धड़कें
नीम-दिलों के नील किनारे तब सामान-ए-हनूत बहाना

कुछ दरबारी घोड़ों पर भगदड़ से बड़ी मुसीबत ये है
गली गली के ख़रगोशों को हाल बहुत मरबूत सुनाना

रंग-बिरंगी तस्ख़ीरों के बिस्तर का रूमान सँभालो
पाएँती ख़्वाह जुदागाना हो रक्खो मगर मख़लूत सिरहाना

मेहराब-ओ-मीनार-ओ-गुम्बद याद की इक तज्सीम तो होंगे
जब ता'मीर-ए-मोहब्बत करना हर गोशा मख़रूत बनाना

रस्म-ओ-राह बढ़ी तो हुस्न के हर पहलू से 'इलाक़ा रहेगा
ख़ित्ता-ए-ख़ाकी से रोज़ाना ग़ैर-ज़रूरी ख़ुतूत मिटाना

मेरी गुमटी पर से उभरे और उस की बुर्जी में डूबे
दिल के सितारे तेरे तुलूअ' से मुझ को तेरा सुक़ूत सुहाना