उर्दू शायरी · ग़ज़ल

teri mohabbat mein gham jo aae to us se baDh kar KHushi nahin hai

तिरी मोहब्बत में ग़म जो आए तो उस से बढ़ कर ख़ुशी नहीं है

تری محبت میں غم جو آئے تو اس سے بڑھ کر خوشی نہیں ہے

शायर: JaiKrishn Chaudhry Habeeb8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरी मोहब्बत में ग़म जो आए तो उस से बढ़ कर ख़ुशी नहीं है
वफ़ा की मंज़िल के ख़ार में भी गुलों से कम दिल-कशी नहीं है

न तुझ में जुरअत है रिंद की सी न तुझ में वुसअ'त दिल-ओ-नज़र की
अज़ीम शय है ये रस्म-ए-रिंदी ये सिर्फ़ बादा-कशी नहीं है

लिबास-ए-नौ में हवस ने आ कर मज़ाक़-ए-हुस्न-ओ-नज़र हैं बदले
वो इश्क़ में है न सरफ़रोशी वो हुस्न में दिलबरी नहीं है

तुझी से गर्मी थी महफ़िलों की तुझी से थी वो चमन की सैरें
नहीं वो महफ़िल में लुत्फ़ बाक़ी गुलों के लब पर हँसी नहीं है

नहीं ये मुमकिन कि उस के दर से तू ख़ाली दामन ही लौट जाए
तलब ही तेरी है ख़ाम अब तक नज़र भी दर पर जमी नहीं है

ख़िरद की गो हैं हज़ार आँखें है दिल की सिर्फ़ एक आँख लेकिन
जो दिल की बुझ जाए शम-ए-उल्फ़त तो फिर कहीं रौशनी नहीं है

ग़म-आश्ना तेरा दिल नहीं है तो आए उस में गुदाज़ कैसे
जो साज़ दिल का नहीं है टूटा तो उस में फिर नग़्मगी नहीं है

करोगे क्या तुम 'हबीब' आख़िर हयात-ए-तूल-ओ-तवील ले कर
तबस्सुम-ए-गुल के एक लम्हे में क्या कोई ज़िंदगी नहीं है