उर्दू शायरी · ग़ज़ल

teri manzil-e-gham ka ghammaz tha

तिरी मंज़िल-ए-ग़म का ग़म्माज़ था

تری منزل غم کا غماز تھا

शायर: Zafar Iqbal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरी मंज़िल-ए-ग़म का ग़म्माज़ था
यही जो तिरा शौक़-ए-परवाज़ था

रहा हो के ज़ाहिर भी पोशीदा तू
दिल-ए-दहर का कौन सा राज़ था

बहुत मुज़्तरिब थी कोई मौज-ए-ख़ूँ
बहुत मुनफ़रिद कोई अंदाज़ था

दम-ए-वापसीं पास होता भी कौन
कि तू आप ही अपना दम-साज़ था

तिरी याद में जल्सा-ए-ता'ज़ियत
तुझे भूल जाने का आग़ाज़ था