उर्दू शायरी · ग़ज़ल

teri jafa ba-KHuda bais-e-gazand nahin

तिरी जफ़ा ब-ख़ुदा बाइ'स-ए-गज़ंद नहीं

تری جفا بخدا باعث گزند نہیں

शायर: Jaleel Qidwai8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरी जफ़ा ब-ख़ुदा बाइ'स-ए-गज़ंद नहीं
मज़ाक़-ए-इश्क़ तिरा कुछ मगर बुलंद नहीं

नियाज़-ए-हुस्न के क़ाबिल तो मैं नहीं लेकिन
ये किस तरह से कहूँ मैं नियाज़-मंद नहीं

उसे ख़बर नहीं क्या शय है इशरत-ए-अबदी
जो तेरे दर्द-ए-मोहब्बत से बहरा-मंद नहीं

बड़ा हो कोई तो ख़ातिर में हम नहीं लाते
जो पस्त हो के मोहब्बत में सर-बुलंद नहीं

नज़र के सामने फिरती है किस लिए हर दम
वो इक अदा जो उसे ख़ुद भी कुछ पसंद नहीं

नहीं कि शर्म-ओ-हया वस्फ़-ए-ख़ास है उस का
कि ये हिजाबी-ओ-शोख़ी में वो भी बंद नहीं

हज़ार काम हैं ऐसे जिन्हें मैं करता हूँ
अगरचे दिल से मुझे एक भी पसंद नहीं

सताने वालों से अपने ये पूछता हूँ 'जलील'
तुम्हारे सीनों में क्या क़ल्ब-ए-दर्द-मंद नहीं