उर्दू शायरी · ग़ज़ल

teri bewafai ke baad bhi mere dil ka pyar nahin gaya

तिरी बेवफ़ाई के बाद भी मिरे दिल का प्यार नहीं गया

تری بے وفائی کے بعد بھی مرے دل کا پیار نہیں گیا

शायर: Qaisarul Jafri8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरी बेवफ़ाई के बाद भी मिरे दिल का प्यार नहीं गया
शब-ए-इंतिज़ार गुज़र गई ग़म-ए-इंतिज़ार नहीं गया

मैं समुंदरों का नसीब था मिरा डूबना भी अजीब था
मिरे दिल ने मुझ से बहुत कहा मैं उतर के पार नहीं गया

तू मिरा शरीक-ए-सफ़र नहीं मिरे दिल से दूर मगर नहीं
तिरी मम्लिकत न रही मगर तिरा इख़्तियार नहीं गया

उसे इतना सोचा है रोज़ ओ शब कि सवाल-ए-दीद रहा न अब
वो गली भी ज़ेर-ए-तवाफ़ है जहाँ एक बार नहीं गया

कभी कोई वादा वफ़ा न कर यूँही रोज़ रोज़ बहाना कर
तू फ़रेब दे के चला गया तिरा ए'तिबार नहीं गया

मुझे उस के ज़र्फ़ की क्या ख़बर कहीं और जा के हँसे अगर
मिरे हाल-ए-दिल पे तो रोए बिन कोई ग़म-गुसार नहीं गया

उसे क्या ख़बर कि शिकस्तगी है जुनूँ की मंज़िल-ए-आगही
जो मता-ए-शीशा-ए-दिल लिए सर-ए-कू-ए-यार नहीं गया

मिरी ज़िंदगी मिरी शाइरी किसी ग़म की देन है 'जाफ़री'
दिल ओ जाँ का क़र्ज़ चुका दिया मैं गुनाहगार नहीं गया