उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere nigah-e-karam jab bikhar gai hogi

तिरे निगाह-ए-करम जब बिखर गई होगी

ترے نگاہ کرم جب بکھر گئی ہوگی

शायर: Daur Afridi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरे निगाह-ए-करम जब बिखर गई होगी
किसी ग़रीब की दुनिया सँवर गई होगी

तुझी को ढूँढती फिरती हैं दर-ब-दर आँखें
अज़ल के रोज़ तुझी पर नज़र गई होगी

सुकूत-ए-साज़-ए-दो-आलम सुनाई देता है
तिरे फ़िराक़ में दुनिया ठहर गई होगी

सहर के चाहने वाले का क्या हुआ होगा
ब-नाम-ए-तीरा-शबी जब सहर गई होगी

वो इक ख़बर कि जो रुस्वाइयों का बाइ'स थी
हज़ार रंग में वो इक ख़बर गई होगी

सहर के नर्म-ओ-ख़ुनुक दूधिया उजालों में
तिरे जमाल की रंगत बिखर गई होगी

ये शश-जिहत है तिरे क़ातिलों का देस तो फिर
तिरे ख़ुलूस की अर्थी किधर गई होगी