उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere maiKHane mein aise bahut mai-KHwar baiThe hain

तिरे मयख़ाने में ऐसे बहुत मय-ख़्वार बैठे हैं

ترے میخانے میں ایسے بہت مے خوار بیٹھے ہیں

शायर: Jagdish Sahay Saxena6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरे मयख़ाने में ऐसे बहुत मय-ख़्वार बैठे हैं
मय-ए-हस्ती जो पी कर साक़िया बेज़ार बैठे हैं

तड़पता हूँ तो मुझ को ज़िंदगी का लुत्फ़ आता है
न जाने सर झुकाए क्यों मिरे ग़म-ख़्वार बैठे हैं

नज़र आती है बर्क़-ए-तूर मयख़ाने में ऐ ज़ाहिद
मगर दैर-ओ-हरम में तालिब-ए-दीदार बैठे हैं

दिल-ए-पुर-दाग़ को देखो न तुम चश्म-ए-हिक़ारत से
लिए पहलू में हम इक गुलशन-ए-बे-ख़ार बैठे हैं

हुकूमत की ये ख़ूबी है कि अपनी ख़ूबी-ए-क़िस्मत
हमारे मुल्क में अहल-ए-हुनर बे-कार बैठे हैं

हरम है राह जन्नत की मिरी जन्नत है मय-ख़ाना
वहाँ दीदार बैठे हैं यहाँ मय-ख़्वार बैठे हैं