उर्दू शायरी · ग़ज़ल

azal se baada-e-hasti ki arzani nahin jati

अज़ल से बादा-ए-हस्ती की अर्ज़ानी नहीं जाती

ازل سے بادۂ ہستی کی ارزانی نہیں جاتی

शायर: Jagdish Sahay Saxena6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अज़ल से बादा-ए-हस्ती की अर्ज़ानी नहीं जाती
इस अर्ज़ानी पे भी उस की फ़रावानी नहीं जाती

हुजूम-ए-रंज-ओ-ग़म ने इस क़दर मुझ को रुलाया है
कि अब राहत की सूरत मुझ से पहचानी नहीं जाती

हुई थी इक ख़ता सरज़द सो उस को मुद्दतें गुज़रीं
मगर अब तक मिरे दिल से पशेमानी नहीं जाती

चमन-ज़ार-ए-तमन्ना का फ़क़त इक फूल मुरझाया
उसी दिन से मिरे गुलशन की वीरानी नहीं जाती

मिरे अश्कों से क्या निस्बत तुम्हें ऐ अंजुम-ए-गर्दूं
कि उन की रोज़-ए-रौशन में भी ताबानी नहीं जाती

मिरी वहशत में शायद आ चले अंदाज़-ए-रानाई
कि ज़ुल्फ़ों की तरह दिल की परेशानी नहीं जाती