उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ehsan hai go tera sitam uTh nahin sakta

एहसान है गो तेरा सितम उठ नहीं सकता

احسان ہے گو تیرا ستم اٹھ نہیں سکتا

शायर: Jagdish Sahay Saxena6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

एहसान है गो तेरा सितम उठ नहीं सकता
ख़ुद्दार से ये बार-ए-करम उठ नहीं सकता

ख़ुद बुत के पुजारी न समझ पाए हक़ीक़त
तुम से ये हिजाब अहल-ए-हरम उठ नहीं सकता

अब बुत हैं हरम में न तजल्ली-ए-बुताँ है
का'बे की तरफ़ मेरा क़दम उठ नहीं सकता

जिस दर्द पे नाज़ाँ हैं शहीदान-ए-मोहब्बत
वो दिल में कभी तेरे सनम उठ नहीं सकता

हूँ राहत-ओ-आराम से इमदाद का तालिब
अब दिल से मिरे बार-ए-अलम उठ नहीं सकता

ए'ज़ाज़ ये हासिल है फ़क़त अहल-ए-क़लम को
हर एक से हाथों में क़लम उठ नहीं सकता