उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere labon pe agar surKHi-e-wafa hi nahin

तिरे लबों पे अगर सुर्ख़ी-ए-वफ़ा ही नहीं

ترے لبوں پہ اگر سرخی وفا ہی نہیں

शायर: Zafar Iqbal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरे लबों पे अगर सुर्ख़ी-ए-वफ़ा ही नहीं
तो ये बनाओ ये सज धज तुझे रवा ही नहीं

मैं तेरी रूह की पत्ती की तरह काँप गया
हवा-ए-सुब्ह-ए-सुबुक-गाम को पता ही नहीं

किसी उमीद के फूलों भरे शबिस्ताँ से
जो आँख मल के उठा हूँ तो वो हुआ ही नहीं

फ़राज़-ए-शाम से गिरता रहा फ़साना-ए-शब
गदा-ए-गौहर-ए-गुफ़्तार ने सुना ही नहीं

चमक रहा है मिरी ज़िंदगी का हर लम्हा
मैं क्या करूँ कि मिरी आँख में ज़िया ही नहीं