उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tilism-e-hosh-ruba hai kamal rakhta hai

तिलिस्म-ए-होश-रुबा है कमाल रखता है

طلسم ہوش ربا ہے کمال رکھتا ہے

शायर: Aarif Akhtar Naqvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिलिस्म-ए-होश-रुबा है कमाल रखता है
बदन से इश्क़ न करना ज़वाल रखता है

कहीं का रहने न देगा हमें ये ज़ेहन-ए-रसा
जवाब जिन के नहीं वो सवाल रखता है

ख़िरद से थक के हम आते हैं दिल के दामन में
ये ग़म-गुसार हमारा ख़याल रखता है

गिरा है अपनी ही नज़रों में जाने कितनी बार
वही जो आज उरूज-ओ-कमाल रखता है

सुबूत-ए-ज़िंदा-दिली है ख़ुदा का शुक्र 'आरिफ़'
ये दिल जो अब भी उमीद-ए-विसाल रखता है