उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hae kis darja be-makan hun main

हाए किस दर्जा बे-मकान हूँ मैं

ہائے کس درجہ بے مکان ہوں میں

शायर: Aarif Akhtar Naqvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हाए किस दर्जा बे-मकान हूँ मैं
दो ज़मानों के दरमियान हूँ मैं

जो लिखी जा रही है कल के लिए
वो अधूरी सी दास्तान हूँ मैं

जिस की क़ीमत नहीं है अब कोई
उस रिवायत का पासबान हूँ मैं

आईना देख कर ये सोचता हूँ
कुछ हक़ीक़त हूँ कि गुमान हूँ मैं

ज़िंदगी अब तो मुझ को जाने दे
कब से मसरूफ़-ए-इम्तिहान हूँ मैं

गीत गाए थे जिस की उल्फ़त के
उसी नगरी में बे-अमान हूँ मैं

जीत आख़िर में हक़ की होना है
हाँ अभी इतना ख़ुश-गुमान हूँ मैं