उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ahd-e-ulfat mein ye KHadsha kab tha

अहद-ए-उल्फ़त में ये ख़दशा कब था

عہد الفت میں یہ خدشہ کب تھا

शायर: Aarif Akhtar Naqvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अहद-ए-उल्फ़त में ये ख़दशा कब था
तुम से बिछड़ेंगे ये सोचा कब था

रात आईना जो देखा तो लगा
इतना वीराँ मेरा चेहरा कब था

मुझ पे इल्ज़ाम लगाने वाले
तू मुझे ठीक से समझा कब था

याद आएँगी वो रिम-झिम आँखें
घर से चलते हुए सोचा कब था

उस को नज़दीक से देखा 'आरिफ़'
आज जैसा है कल ऐसा कब था