उर्दू शायरी · ग़ज़ल

thoDa kabhi kabhi to ziyaada laga hua

थोड़ा कभी कभी तो ज़ियादा लगा हुआ

تھوڑا کبھی کبھی تو زیادہ لگا ہوا

शायर: Ghalib Duraib7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

थोड़ा कभी कभी तो ज़ियादा लगा हुआ
रहता है दिल में कोई तमाशा लगा हुआ

तुझ को मैं छोड़ तो दूँ मिरी दिलरुबा मगर
कब छूटता है कोई भी नश्शा लगा हुआ

पाया भी मैं ने उस को मुकम्मल नहीं है और
खोने का उस के रहता है धड़का लगा हुआ

दिल ही को मेरे भाया नहीं वो पराया पेड़
शाख़ों पे उस के फल भी था वर्ना लगा हुआ

अब के हवा-ए-'इश्क़ चली है कुछ इस तरह
जिस सम्त देखो है यही चर्चा लगा हुआ

तक़दीर में लिखी नहीं शायद कोई ख़ुशी
हर वक़्त ग़म का रहता है ताँता लगा हुआ

मुझ को लगा था ज़ख़्म कोई पहली पहली बार
और ज़ख़्म भी था मुझ को वो गहरा लगा हुआ