उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tha unki tarah main bhi aaghaz mein saudai

था उन की तरह मैं भी आग़ाज़ में सौदाई

تھا ان کی طرح میں بھی آغاز میں سودائی

शायर: Jafar Raza7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

था उन की तरह मैं भी आग़ाज़ में सौदाई
बढ़ने दो जुनूँ याराँ आ जाएगी दानाई

फिर दिल का तक़ाज़ा है उस शोख़ से कुछ कहिए
फिर कोह-ए-तमन्ना पर इक बर्क़ सी लहराई

आईन-ए-ज़बाँ-बंदी जिस अहद में नाफ़िज़ हो
इस अहद में ख़ामोशी हो जाए है गोयाई

जब आग लगी घर में था कौन बुझाने को
अब तक तो मिला हम को हर शख़्स तमाशाई

हुश्यारी में ग़फ़लत सी ग़फ़लत में भी हुश्यारी
है तेरे क़लंदर में इक शान-ए-शकेबाई

ख़ामोश खड़ा था मैं सब क़त्ल के दरपय थे
जब ग़ौर से देखा तो उन में था मिरा भाई

दिन-भर तो शिकारे में घूमे हैं जनाब-ए-शैख़
कहते हैं धरा क्या है हर-सम्त ब-जुज़ काई