उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tha anjuman mein ghair ki dilbar bana hua

था अंजुमन में ग़ैर की दिलबर बना हुआ

تھا انجمن میں غیر کی دلبر بنا ہوا

शायर: Badr Jamali6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

था अंजुमन में ग़ैर की दिलबर बना हुआ
बैठा है मेरे सामने पत्थर बना हुआ

बन कर बिगड़ना 'अर्सा-ए-हस्ती के खेल हैं
बिगड़ा हज़ार बार मुक़द्दर बना हुआ

आ जाओ दिल में रौनक़-ए-हर-ज़िंदगी लिए
मौजूद है तुम्हारे लिए घर बना हुआ

इक शख़्स मेरे साथ ही रहता है रात-दिन
आईना-ए-हयात का जौहर बना हुआ

पत्थर फिर उस के हाथ में किस ने थमा दिए
ख़ूनीं है राह राह का मंज़र बना हुआ

अहल-ए-नज़र है बद्र 'जमाली' न अहल-ए-फ़न
इतराता फिर रहा है सुख़नवर बना हुआ