उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere wade ka iKHtitam nahin

तेरे वादे का इख़्तिताम नहीं

تیرے وعدے کا اختتام نہیں

शायर: Qalaq Merathi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तेरे वादे का इख़्तिताम नहीं
कि क़यामत पे भी क़याम नहीं

बेवफ़ाई तुम्हारी आम हुई
अब किसी को किसी से काम नहीं

किस लिए दावा-ए-ज़ुलेख़ाई
ग़ैर यूसुफ़ नहीं ग़ुलाम नहीं

वस्ल के बअ'द हिज्र का क्या काम
दूर गर्दूं का इंतिज़ाम नहीं

कौन सुनता है नाला-ओ-फ़रियाद
चर्ख़ को ख़ौफ़-ए-इंतिक़ाम नहीं

ख़ाल-ए-लब देख कर हुआ मालूम
कोई दाना बग़ैर-ए-दाम नहीं

आप में क्यूँ कि आऊँ जब कि तू आए
ख़ल्वत-ए-ख़ास बज़्म-ए-आम नहीं

नाला करता हूँ लोग सुनते हैं
आप से मेरा कुछ कलाम नहीं

जिस जगह है वहाँ भी है बोहतान
कि किसी जा तिरा मक़ाम नहीं

रोज़-ए-फ़ुर्क़त को रोज़-ए-हश्र न जान
शाम पर भी तो इख़्तिताम नहीं

है ख़ुदा ही 'क़लक़' जो आज बुझे
सुब्ह होते नहीं कि शाम नहीं