उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere shahr-e-rang-o-bu mein KHauf bhi kuchh kam nahin

तेरे शहर-ए-रंग-ओ-बू में ख़ौफ़ भी कुछ कम नहीं

تیرے شہر رنگ و بو میں خوف بھی کچھ کم نہیں

शायर: M Ali8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तेरे शहर-ए-रंग-ओ-बू में ख़ौफ़ भी कुछ कम नहीं
छतरियाँ हाथों में हैं बारिश का जब मौसम नहीं

तेरे दर से पा रहे हैं वो मसीहा का ख़िताब
जिन के हाथों में नमक है ज़ख़्म का मरहम नहीं

जंग-नामा लिखने वालो नाम क्या दोगे हमें
लड़ रहे हैं ज़िंदगी से हाथ में परचम नहीं

जानते हैं आँसुओं की क़द्र-ओ-क़ीमत ख़ूब हम
दिल में है मौजों की शोरिश आँख फिर भी नम नहीं

यूँ तो है मौजूद सूरज फिर भी ये अंधेर क्या
नींद है किरनों पे तारी सुब्ह का 'आलम नहीं

ख़ुशबुओं की तरह गुज़रो बे-ख़तर बढ़ते चलो
ये दिलों के रास्ते हैं इन में पेच-ओ-ख़म नहीं

इक हयात-ए-नौ छुपी है कर्बला की राह में
कर्बला राह-ए-'अमल है मंज़िल-ए-मातम नहीं

शे'रियत मिलती नहीं अब तेरे शे'रों में 'अली'
रुक गई हैं सूईयाँ तेरी घड़ी में दम नहीं