उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek poras bhi sikandar hai tumhein kya malum

एक पोरस भी सिकंदर है तुम्हें क्या मा'लूम

ایک پورس بھی سکندر ہے تمہیں کیا معلوم

शायर: M Ali7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

एक पोरस भी सिकंदर है तुम्हें क्या मा'लूम
मोम अपनी जगह पत्थर है तुम्हें क्या मा'लूम

भीड़ रिश्तों की भी है और है तन्हाई भी
घर में रह कर कोई बे-घर है तुम्हें क्या मा'लूम

फूल से होंट भी कर जाते हैं दिल को ज़ख़्मी
उस की हर बात में ख़ंजर है तुम्हें क्या मा'लूम

अश्क मजबूरों के मजबूर नहीं होते हैं
एक इक बूँद समुंदर है तुम्हें क्या मा'लूम

प्यास बुझती है कहीं रेत के दरियाओं से
आब ये आब का मंज़र है तुम्हें क्या मा'लूम

चाँद इक ज़ख़्म की मानिंद सितारे आँसू
रात भी एक सितम-गर है तुम्हें क्या मा'लूम

ज़िंदगी क्या है महीवाल से पूछे कोई
एक घुलती हुई गागर है तुम्हें क्या मा'लूम