उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere shahr-e-rang-o-bu ke manzar jhuTe lagte hain

तेरे शहर-ए-रंग-ओ-बू के मंज़र झूटे लगते हैं

تیرے شہر رنگ و بو کے منظر جھوٹے لگتے ہیں

शायर: M Ali7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तेरे शहर-ए-रंग-ओ-बू के मंज़र झूटे लगते हैं
सारे आज़र मसनू'ई हैं पत्थर झूटे लगते हैं

जंग-ए-बक़ा इक नाटक जैसी ज़ख़्म हैं रंगों के धब्बे
रक़्स-ए-जुनूँ है एक नुमाइश ख़ंजर झूटे लगते हैं

जश्न-ए-बहाराँ इक धोका है फूल हैं सारे काग़ज़ के
ख़ुश्क है सागर सीप है नक़ली गौहर झूटे लगते हैं

बज़्म-ए-वफ़ा है सूनी सूनी शम'-ए-तमन्ना है ख़ामोश
कूचा-ए-जानाँ उजड़ा उजड़ा दिल-बर झूटे लगते हैं

ना'रों में जज़्बात नहीं हैं आवाज़ें हैं ख़ाली ढोल
जुमले बे-दम लफ़्ज़ हैं साकित मसदर झूटे लगते हैं

आज भी सरमद है सूली पर ज़हर पिए जाए सुक़रात
आज भी है इंसाफ़ पशेमाँ दावर झूटे लगते हैं

चलते चलते थक गईं आँखें सुब्ह मिली तो काली सी
ये भी 'अली' है कोई मंज़िल रहबर झूटे लगते हैं