उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tarz-e-qudsi mein kabhi shewa-e-insan mein kabhi

तर्ज़-ए-क़ुदसी में कभी शेवा-ए-इंसाँ में कभी

طرز قدسی میں کبھی شیوۂ انساں میں کبھی

शायर: Dagh Dehlvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तर्ज़-ए-क़ुदसी में कभी शेवा-ए-इंसाँ में कभी
हम भी इक चीज़ थे इस आलम-ए-इम्काँ में कभी

रंज में रंज का राहत में हूँ राहत का शरीक
ख़ाक साहिल में कभी मौज हूँ तूफ़ाँ में कभी

दिल में बे-लुत्फ़ रही ख़ार-ए-तमन्ना की ख़लिश
नोक बन कर न रहा ये किसी मिज़्गाँ में कभी

वार करते ही भरा ज़ख़्म में क़ातिल ने नमक
तेग़ पर हाथ कभी है तो नमक-दाँ में कभी

ख़िज़्र से मैं ने जो कीं जोश-ए-जुनूँ की बातें
ऐसे निकले कि न आए थे बयाबाँ में कभी

अल्लह अल्लह रे तिरी शोख़-बयानी ऐ 'दाग़'
सुस्त इक शे'र न देखा तिरे दीवाँ में कभी