उर्दू शायरी · ग़ज़ल

taraqqiyon ki dauD mein usi ka zor chal gaya

तरक़्क़ियों की दौड़ में उसी का ज़ोर चल गया

ترقیوں کی دوڑ میں اسی کا زور چل گیا

शायर: Naeem Akhtar Khadimi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तरक़्क़ियों की दौड़ में उसी का ज़ोर चल गया
बना के अपना रास्ता जो भीड़ से निकल गया

सुलग उठेंगे जाने कितने दिल हसद की आग से
अगर हवा के सामने मिरा चराग़ जल गया

कहाँ तू बात कर रहा था खेलने की आग से
ज़रा सी आँच क्या लगी कि मोम सा पिघल गया

ज़रा सी देर के लिए जो आ गया मैं अब्र में
उधर ये शोर मच गया कि आफ़्ताब ढल गया

'उरूज पर नसीब था तो छू रहा था आसमाँ
बिगड़ गया नसीब तो ज़मीं से भी फिसल गया

मुझी को अपनी शक्ल आज लग रही है अजनबी
न जाने कौन मेरे घर के आइने बदल गया

तिरी मिरी निगाह के चराग़ यूँ न जल सके
कभी हवाएँ चल पड़ीं कभी समाँ बदल गया

'न'ईम' हिजरतों की रुत ने ज़ोर भी दिया मगर
न बाग़ से हवा गई न झील से कँवल गया