उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bikhre to phir zamane ki Thokar mein aa gae

बिखरे तो फिर ज़माने की ठोकर में आ गए

بکھرے تو پھر زمانے کی ٹھوکر میں آ گئے

शायर: Naeem Akhtar Khadimi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बिखरे तो फिर ज़माने की ठोकर में आ गए
और मुत्तहिद हुए तो इक 'आलम पे छा गए

ता'दाद यूँ तो तीन सौ तेरह की थी मगर
जब हमला-ज़न हुए तो हज़ारों पे छा गए

अपने भी नाम का तिरे तरकश में तीर है
ये सुन के ख़ुद ही तेरे निशाने प आ गए

बीवी की चाह बेटे के ग़म में रुके नहीं
तूफ़ाँ बढ़ा तो नूह भी कश्ती बढ़ा गए

ज़ख़्मी हुए तो होंगे 'न'ईम' उन के हाथ भी
गुल की जगह जो राह में काँटे बिछा गए