उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tapish kyon baDh rahi hai raston ki

तपिश क्यों बढ़ रही है रास्तों की

تپش کیوں بڑھ رہی ہے راستوں کی

शायर: Chand Kakralvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तपिश क्यों बढ़ रही है रास्तों की
क़ज़ा आने को है क्या आबलों की

हमारे हाथ हीरा हो गए हैं
घिसाई करते करते पत्थरों की

हवा के साथ चलना पड़ रहा है
बड़ी मजबूरियाँ हैं बादलों की

जहाँ तक साथ ले जाएँ हवाएँ
वहीं तक ज़िंदगी है ख़ुशबुओं की

यक़ीनन फूल कोई खिल गया है
नहीं तो भीड़ क्यों है तितलियों की

उसी के सामने रोऊँगा जा कर
जो क़ीमत जानता है आँसुओं की

हटा कर 'चाँद' ने चेहरे से पर्दा
ज़बानें काट दीं तारीकियों की