उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tamam umr ka dukh tha waba ke mausam mein

तमाम उम्र का दुख था वबा के मौसम में

تمام عمر کا دکھ تھا وبا کے موسم میں

शायर: Tahir Hanfi14 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तमाम उम्र का दुख था वबा के मौसम में
मैं इस लिए भी था रोया वबा के मौसम में

कल आसमान जो चीख़ा वबा के मौसम में
सभी ने रास्ता बदला वबा के मौसम में

सिसकती प्यास ज़मीं-बुर्द हो गई ऐसे
कि दरिया रो पड़ा सारा वबा के मौसम में

तुम्हारी आँख की अफ़्सुर्दगी से टूट गया
जो एक सपना बना था वबा के मौसम में

मिरी ख़ताओं को मालिक मिरा मुआ'फ़ करे
दुआ को हाथ उठाया वबा के मौसम में

न इम्तिहान पे अब इम्तिहान ले मौला
कि सज्दा-रेज़ है दुनिया वबा के मौसम में

उजाला नूर का फैला है आसमानों पर
ज़मीं का रंग भी बदला वबा के मौसम में

शजर ने ओढ़ लिया है ग़िलाफ़-ए-बर्ग-ए-नौ
कि बर्ग-ए-ख़ुश्क है तन्हा वबा के मौसम में

मैं ख़ाली हाथ तिरी बारगह में आ पहुँचा
करम हो मुझ पे ख़ुदाया वबा के मौसम में

मिरी नवा में तू मत ढूँड मुफ़लिसी का अक्स
हिसाब सब का है अपना वबा के मौसम में

हमारे मिलने पे क़दग़न लगी थी वर्ना मैं
मोहब्बतों को भी पाता वबा के मौसम में

बस आसमान-ओ-ज़मीं पर ख़ुदा का चर्चा है
हर इक तरफ़ उसे देखा वबा के मौसम में

उसी को ओढ़ के बैठा हूँ अपने हुजरे में
यही क़बा-ए-दरीदा वबा के मौसम में

ज़मीं पे बोझ था 'ताहिर' मिरे गुनाहों का
मैं अपना दर्द न लिखता वबा के मौसम में