उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tab se wafa ka tazkira gunge ka KHwab ho gaya

तब से वफ़ा का तज़्किरा गूँगे का ख़्वाब हो गया

تب سے وفا کا تذکرہ گونگے کا خواب ہو گیا

शायर: Parwez Rahmani6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तब से वफ़ा का तज़्किरा गूँगे का ख़्वाब हो गया
जब से मैं दिल-ब-दर हुआ ख़ाना-ख़राब हो गया

पाए निगाह आ लगे जब लब-ए-मंज़िल-ए-तलब
आँखें पुर-आब हो गईं दरिया सराब हो गया

अपने जहाज़ ले के तब आए जहाज़-रान कब
मेरा जज़ीरा-ए-वजूद जब तह-ए-आब हो गया

चश्म-ए-वज़ीर-ए-मुम्लिकत उस पे हुई जो मेहरबाँ
तब से वो नंग-ए-शहर भी आली-जनाब हो गया

हाए मिरी जबीन से सज्दे के दाग़ धुल गए
सर पे पड़ा हुआ था जो साया सहाब हो गया

जब से हमारे हाथ से छीना बुतों ने इख़्तियार
अपना सनम-कदों में रहना अज़ाब हो गया