उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ta-hadd-e-binai andar bahar hur

ता-हद्द-ए-बीनाई अंदर बाहर हूर

تا حد بینائی اندر باہر حور

शायर: Tahir Saood Kiratpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ता-हद्द-ए-बीनाई अंदर बाहर हूर
ये कैसा मंज़र है मंज़र-मंज़र हूर

मैं कैसे जन्नत के बाला-ख़ाने में
क्या कोई बतला सकती है आ कर हूर

दिल के सातों दरिया मीठे फ़रमा कर
ख़्वाब से वापस हो जाती है अक्सर हूर

तेरे पाँव की धूल के सदक़े सुर्ख़ गुलाब
चाँद सितारे और बेहतर से बेहतर हूर

मुफ़्ती-ए-'इश्क़ ने ये फ़तवा फ़रमाया है
उस की झूटी हर ता'रीफ़ पे सत्तर हूर

उस के यहाँ तब्लीग़ तो है तख़्लीक़ नहीं
या'नी उस के सब शे'रों का महवर हूर

किसी ने क्या तस्वीर बनाई है 'ताहिर'
जिस्म बरहना साहिल और समुंदर हूर