उर्दू शायरी · ग़ज़ल

surahi muzmahil hai mai ka pyala thak chuka hai

सुराही मुज़्महिल है मय का प्याला थक चुका है

صراحی مضمحل ہے مے کا پیالہ تھک چکا ہے

शायर: Faiz Khalilabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुराही मुज़्महिल है मय का प्याला थक चुका है
दर-ए-साक़ी पे हर इक आने वाला थक चुका है

अँधेरो आओ आ कर तुम ही कुछ आराम दे दो
कि चलते चलते बेचारा उजाला थक चुका है

'अदावत की दरारें वैसी की वैसी हैं अब तक
वो भरते भरते उल्फ़त का मसाला थक चुका है

मुझे लूटा ज़रूरत की यहाँ हर कंपनी ने
मुसलसल करते करते दिल किफ़ालत थक चुका है

सुख़न में कुछ नए मजमू'आ ले कर आइए आप
पुरानी शा'इरी से हर रिसाला थक चुका है

बता ऐ 'फ़ैज़' आख़िर गाँव जा कर क्या करेगा
तू जिस के नाम की जपता था माला थक चुका है