उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sulagti dhup mein har saeban de chuka hun

सुलगती धूप में हर साएबान दे चुका हूँ

سلگتی دھوپ میں ہر سائبان دے چکا ہوں

शायर: Faiz Khalilabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुलगती धूप में हर साएबान दे चुका हूँ
मैं इस ज़मीं को कई आसमान दे चुका हूँ

वो तेरे इश्क़ का हो या तिरी जुदाई का
इसी हयात में सब इम्तिहान दे चुका हूँ

तू दिल-नशीं है वफ़ादार है ज़हीन भी है
मगर मैं और किसी को ज़बान दे चुका हूँ

मिरी ज़बान पे ताला लगाने वाले सुनें
मैं अपनी आँखों से अपना बयान दे चुका हूँ

वो आदमी मुझे बेचैनियाँ पिला रहा है
जिसे सुखों का मैं सारा जहान दे चुका हूँ

मिरे वजूद को मिट्टी की शक्ल दी जिस ने
ये मिट्टी मैं उसी मिट्टी को दान दे चुका हूँ

मुझे भुलाएँगे वो 'फ़ैज़' किस तरह आख़िर
वो जिन लबों को मैं अपने निशान दे चुका हूँ