उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sukut-e-zard kabhi surKH si sada ho kar

सुकूत-ए-ज़र्द कभी सुर्ख़ सी सदा हो कर

سکوت زرد کبھی سرخ سی صدا ہو کر

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुकूत-ए-ज़र्द कभी सुर्ख़ सी सदा हो कर
मुझे दिखाई दिया ज़हर क्या से क्या हो कर

रवाँ रहा मिरे सीने पे रात का दरिया
घिरा था सर पे सियह आसमाँ घटा हो कर

सफ़ेद साँप कि सोया पड़ा था जंगल में
चमक गया मिरी आँखों में रास्ता हो कर

ये सत्ह-ए-आब की लर्ज़िश है मेरे दम से कि मैं
रचा हुआ हूँ फ़ज़ा में रम-ए-हवा हो कर

डराए रखता है सब को जो तेज़ काँटों से
कभी मिला था मुझे शाख़ से जुदा हो कर

बिखर चला हूँ 'ज़फ़र' राख बन के राहों में
मैं दिल की आग से निकला था कीमिया हो कर