उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sukun-e-dil mayassar ho maqam aisa kahan hoga

सुकून-ए-दिल मयस्सर हो मक़ाम ऐसा कहाँ होगा

سکون دل میسر ہو مقام ایسا کہاں ہوگا

शायर: Gauhar Aziz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुकून-ए-दिल मयस्सर हो मक़ाम ऐसा कहाँ होगा
जहाँ ठहरोगे सर पर हसरतों का साएबाँ होगा

लिए फिरते हैं हाथों में यहाँ कुछ लोग क्यों पत्थर
ज़रूर इन बस्तियों में कोई शीशे का मकाँ होगा

न बदला अब भी दस्तूर-ए-त'अल्लुक़ वक़्त के हाथों
रक़ीबों से तुम्हें अब भी रिफ़ाक़त का गुमाँ होगा

तुम अपनी कोशिशों से कोहकन बन जाओगे लेकिन
ज़रूरी तो नहीं कि दूध का दरिया रवाँ होगा

ये आँखें आइने हैं दिल के इन पर तुम यक़ीं रखना
ज़बाँ जो कह न पाएगी इन आँखों से बयाँ होगा

बनो तुम शाएक़-ए-इंसानियत 'गौहर' जहाँ तक हो
ज़मीं होगी तुम्हारी और तुम्हारा आसमाँ होगा