उर्दू शायरी · ग़ज़ल

suKHan-sarai tamasha hai sher bandar hai

सुख़न-सराई तमाशा है शे'र बंदर है

سخن سرائی تماشہ ہے شعر بندر ہے

शायर: Zafar Iqbal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुख़न-सराई तमाशा है शे'र बंदर है
शिकम की मार है शा'इर नहीं मछन्दर है

है जुस्तुजू कभी अपना भी 'अक्स-ए-रुख़ देखूँ
तिरी तलाश नहीं तू तो मेरे अन्दर है

कहीं छुपाए से छुपती है बे-हिसी दिल की
हज़ार कहते फिरें मस्त है क़लंदर है

मज़े की बात है उस को भजन सिखाते हैं
जो ख़ुद ही मूर्ती है और ख़ुद ही मंदर है

जज़ीरा-ए-जुहला में घिरा हुआ हूँ 'ज़फ़र'
निकल के जाऊँ कहाँ चार सू समुंदर है